Wednesday, April 14, 2010

आयेंगे और रह जायेंगे

दिन की रोशनी की आवाज़ कानों में उड़ेलते
चेहरे पर फैले पसीने की सनसनाहट का शोर मचाते
आते होंगे किसी पर्वत की गहराई से
निकलकर किसी आसमान की तराई से
न जाने कौन सी गरम हवा वाली शहनाई से

तकरीरों की झंझट का कोई स्टीली-शीट ओढ़े हुए
फटे हुए कुर्ते का दाहिना हाथ मोड़े हुए
पेड़ की छाल और पत्तों की चादर संभालते हुए
किसी अमीर की क्रिकेट टीम की टोपियाँ उछालते हुए
न जाने कौन-कौन से मर्यादाओं से खून निकालते

अदालतों के दरवाजे पर हथौड़ा चलाते हुए
हड्डियों के बुखार से लोहा गलाते हुए
मौसम को अपने कांख में दबाये हुए
गले की फ़सान में अकुलाये हुए
आयेंगे और रह जायेंगे, छाएंगे
और वापस नहीं जायेंगे

5 comments:

Gyan Dutt Pandey said...

वापस कहां जा रहे हैं हम?
भारतेन्दु से अज्ञेय तक खंगालते,
टटोल रहे हैं अर्थ।
कोई तो बतायेगा हड्डियों का तापमान?
चीयरलीडराओं से ले
सुनन्दा/थरूर/दुबई/छोटा शकील,
कोर्ट-कचहरी-वकील,
सब तलाश डाले।

कौन सी चाभी से खुलते हैं,
इस कविता के ताले?!

गिरीश बिल्लोरे मुकुल said...

बाबू बाल किशन की जै हो

Abhishek Ojha said...

कविता का फर्स्ट हाफ तो बिलकुल ही उपमाओं से भरपूर है !

ZEAL said...

हड्डियों के बुखार से लोहा गलाते हुए
मौसम को अपने कांख में दबाये हुए

A soul stirring creation !

Badhaaii

Blogger said...

bhadiya