सरकार ने लिक्विडिटी को बढ़ावा देते हुए व्याज दरों में गिरावट की. आशा थी कि अब गड्डी बिकेगी.
लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
बिकी तो लेकिन गड्डी नही बल्कि.....
Friday, February 13, 2009
Wednesday, December 10, 2008
कुछ तो कोरा रहे .....
लिख लेते कविता
अगर हाथ में हरी, लाल, पीली पन्नी रहती
लेकिन मिला भी तो सफ़ेद कागज़
कैसे चलाऊँ उसपर कलम?
काली सियाही उसे भद्दा कर देगी
सफ़ेद कागज़ की यही समस्या है
लालच तो देता है
लेकिन डरता भी है
वैसे तो कहता है कुछ लिख दो
लेकिन डरता है इस बात से कि;
चली जायेगी उसकी सफेदी
मौत हो जायेगी उसके सफेदपन की
क्योंकि इस समय की कविता
हमेशा कालापन देती है
और सफ़ेद कागज़ को
इस कालेपन का भय सताता है
फिर सोचता हूँ;
कुछ तो सफ़ेद रहे
कुछ तो कोरा रहे
कागज़ ही सही
अगर हाथ में हरी, लाल, पीली पन्नी रहती
लेकिन मिला भी तो सफ़ेद कागज़
कैसे चलाऊँ उसपर कलम?
काली सियाही उसे भद्दा कर देगी
सफ़ेद कागज़ की यही समस्या है
लालच तो देता है
लेकिन डरता भी है
वैसे तो कहता है कुछ लिख दो
लेकिन डरता है इस बात से कि;
चली जायेगी उसकी सफेदी
मौत हो जायेगी उसके सफेदपन की
क्योंकि इस समय की कविता
हमेशा कालापन देती है
और सफ़ेद कागज़ को
इस कालेपन का भय सताता है
फिर सोचता हूँ;
कुछ तो सफ़ेद रहे
कुछ तो कोरा रहे
कागज़ ही सही
Monday, December 1, 2008
स्साले सारी मोमबत्तियां खरीद ले गए..........
लोडशेडिंग हो गई. दूकान पर कैंडल नहीं मिली.
स्साले सारी मोमबत्तियां खरीद ले गए. कह रहे थे आतंकवाद से जंग लडेंगे.
आतंकवाद से जंग!
माय फुट.
स्साले सारी मोमबत्तियां खरीद ले गए. कह रहे थे आतंकवाद से जंग लडेंगे.
आतंकवाद से जंग!
माय फुट.
Monday, November 17, 2008
उनकी आँख पत्थर की है
शाम से आँख में नमी सी
हैओस की बूँदें आँख में बैठ गयी होंगी
नहीं-नहीं ये आँख की नमी है
क्या कह रहे हो?
अभी आँखें नम होती हैं!
किसकी?
अच्छा, उनकी?
फिर ठीक है
उनकी आँख पत्थर की है
शायद इसीलिए नम हो जाते होगी
....................................................................
मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे
क्या बुनने की तरकीब सीखनी है?
चादर?
तुम नहीं सीख पाओगे
जुलाहे से ऐसा मत कहो
तुम्हारे पाँव तो हमेशा चादर से बाहर रहते हैं
पहले पावों को चादर के भीतर रखना सीखो
.........................................................................
हैओस की बूँदें आँख में बैठ गयी होंगी
नहीं-नहीं ये आँख की नमी है
क्या कह रहे हो?
अभी आँखें नम होती हैं!
किसकी?
अच्छा, उनकी?
फिर ठीक है
उनकी आँख पत्थर की है
शायद इसीलिए नम हो जाते होगी
....................................................................
मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे
क्या बुनने की तरकीब सीखनी है?
चादर?
तुम नहीं सीख पाओगे
जुलाहे से ऐसा मत कहो
तुम्हारे पाँव तो हमेशा चादर से बाहर रहते हैं
पहले पावों को चादर के भीतर रखना सीखो
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Friday, October 3, 2008
आदमी, तरक्की और जिंदगी.

कविता नहीं आपको सच्ची घटना सुनाता हूँ.
किस्सा नहीं आपको ये हकीकत बताता हूँ.
कल सरे-बाज़ार जिंदगी से मुलाकात हुई थी.
बेचारी....... पूरी तरह से लुटी-टूटी हुई थी.
शरीर पर लिए घूम रही गहरे घाव थी,
तेज़ धूप - पसीने से तरबतर--
ढूंढ़ती फ़िर रही वो एक छाँव थी.
मैंने पूछा-
किसे तलाशती हो?
लगता है जैसे कुछ मदद मांगती हो?
किसने किया ये हाल तुम्हारा, लूटे आभूषण सारे?
सत्य, साहस, ईमान, विश्वास, त्याग जैसे रतन तुम्हारे?
कराहकर वो बोली---
जबसे मेरे पति आदमी ने पैसे को अपना ससुर बनाया है
उसकी बेटी तरक्की से दूजा ब्याह रचाया है
तब से मेरा ये हाल हुआ जाता है...
मेरी सौत कि हर ख्वाहिश पर मेरा एक-एक गहना बिका जाता है
असत्य के लिए सत्य को बेचा गया
स्वार्थ के लिए साहस को
बेईमानी के लिए ईमान को बेचा गया
धोखे के लिए विश्वास को
लोभ के लिए त्याग को बेचा गया
कितने युग? कितने जन्म?
कितने जीवन? कितनी साँसे?
अब और नहीं सह सकती, हार मानती हूँ मैं
थक चुकी-- अब तो केवल मौत मांगती हूँ मैं.
मित्रो,
सच्चाई यंहा ख़त्म होती है
आगे कविता शुरू होती है.
लेकिन कविता की कुछ सीमा होती है
कविता की सीमा होती है वाह-वाह
कविता की सीमा होती है आह-आह
कविता की सीमा होती है तालियाँ
कविता की सीमा होती है गालिया
कविता की जो सीमा ना होती
तो शायद...
जिंदगी की ये हालत ना होती.
मित्रो,
इस घटना को भूल ना जाना
कुछ गुन सको तो गुनते जाना.
कुछ कर सको तो करना
ना कर सको तो ना करना
पर इतना जरुर करना
उस आदमी की तरह
अपनी जिंदगी से बेवफाई मत करना.
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कई दिनों से समय नहीं मिलने के कारण आ नहीं पाया था. पर ब्लॉग्गिंग के एक साल पूरे होने की खुशी और उत्साह को रोक नहीं पाया और आप सबके के लिए फ़िर हाजिर हुआ हूँ.
Saturday, August 30, 2008
आख़िर एक इंसान हूँ मैं

इथियोपिया के विख्यात कवि ओसोलन मोसावा की कविता.
रेत की नदी में चलते-चलते
दुखने लगे हैं पाँव
दूर है गाँव
कहाँ से लायें ऐसी नज़र
जो दिखाए
एक पेड़
बिना पत्तों वाला ही सही
कहाँ से लायें ऐसे कान
जो सुनाएं
एक गीत
बिना भाव वाला ही सही
कहाँ से लायें एक जुबान
जो करे
एक शिकायत
भले ही उसका जवाब न मिले
कहाँ से लायें ऐसी आंत
जिसे भूख न लगे
जो सिकुड़ी रहे
खाना न मांगे
सोचता हूँ
तो समझ में आता है
ऐसी नज़र, ऐसी आंत, ऐसा कान और ऐसी जुबान
कहीं नहीं मिलेगी
आख़िर एक इंसान हूँ मैं
....................................................................................................................
भावानुवाद: बालकिशन
चित्र : ट्रेवलएडवेंचर.कॉम से साभार
Saturday, August 23, 2008
हिंडोला
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