Monday, November 17, 2008

उनकी आँख पत्थर की है

शाम से आँख में नमी सी
हैओस की बूँदें आँख में बैठ गयी होंगी
नहीं-नहीं ये आँख की नमी है

क्या कह रहे हो?
अभी आँखें नम होती हैं!
किसकी?

अच्छा, उनकी?
फिर ठीक है
उनकी आँख पत्थर की है
शायद इसीलिए नम हो जाते होगी
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मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे
क्या बुनने की तरकीब सीखनी है?
चादर?

तुम नहीं सीख पाओगे
जुलाहे से ऐसा मत कहो
तुम्हारे पाँव तो हमेशा चादर से बाहर रहते हैं
पहले पावों को चादर के भीतर रखना सीखो
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15 comments:

Gyan Dutt Pandey said...

वाह बालकिशन; पांव चादर में रखने का अभ्यास कर लें। फिर चादर बुनना सिखाने वाले का पता पूछेंगे आप से।
***
कहां रहते हो आजकल?

mehek said...

bahut marmik

शोभा said...

बहुत सुन्दर लिखा है।

Rachna Singh said...

padh kar achha lagaa , vase aaj kal kam sakriyae dikh rahey net par .

प्रहार - महेंद्र मिश्रा said...

वाह बहुत बढ़िया चादर के अन्दर और बाहर पैर पसारने वाली बात अपने कविता के रूप में बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत की है धन्यवाद. पर एक बात पूछना चाहता हूँ कि अभी तक आप कहाँ रहे है आपकी ब्लॉग में काफी अरसे बाद पोस्ट पढ़ने मिली ?

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत दिनों बाद आपका लिखा पढ़ना अच्छा लगा

मीत said...

बहुत ख़ूब भाई.. ... मुझ से इंसान को भी सोचने पर आमादा करती हुई.

जितेन्द़ भगत said...

सुंदर कवि‍ता-
तुम्हारे पाँव तो हमेशा चादर से बाहर रहते हैं
पहले पावों को चादर के भीतर रखना सीखो

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत दिनों में भेंट हुई है। सुंदर कविताएँ हैं।

manvinder bhimber said...

अच्छा, उनकी?
फिर ठीक है
उनकी आँख पत्थर की है
शायद इसीलिए नम हो जाते होगी
सुंदर कविताएँ हैं।

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सुंदर कविता ! शुभकामनाएं !

नीरज गोस्वामी said...

मेरी अदना समझ के बाहर की रचना...कमाल की.
नीरज

अभिषेक ओझा said...

कहाँ रहे इतने दिन?

अनूप शुक्ल said...

बड़ी ऊंची कविता खैंच दी बालकिशनजी!

ओमप्रकाश अगरवाला said...

Balkishan Ji,

I would like to invite u on our blog (blog dedicated to marwari Yuva Manch and Marwari samaaj).

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O.P. Agarwalla
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