Friday, February 22, 2008

घूस देकर सब मैनेज करते हैं मारवाड़ी

"जारा मारवाड़ी, तारा सब किछु पोयसा दिए मैनेज कोरे निच्चे, ऐरा मैनेज मास्टर. बांगालीरा किछु कोरते पारचे ना.
ओरा कोनो काज कोरते गेले 10 परसेंट मनी रेखे दाय. पोयसा दिए जे कोनो काज कोरिये नाय."
अर्थात
"जो मारवाड़ी हैं, वो सब कुछ पैसे देकर मैनेज कर लेते हैं. ये लोग मैनेज मास्टर हैं. बंगाली लोग कुछ नहीं कर पाते हैं. वो लोग कोई भी काम शुरू करते समय 10 परसेंट मनी रख देते हैं. पैसे देकर कोई भी काम करवा लेते हैं."

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अंतरराष्ट्रीय भाषा दिवस की पूर्व संध्या पर भाषा चेतना समिति के कार्यक्रम मे भाषण देते समय बंगाल के भूमि व भूमि सुधार मंत्री माननीय अब्दुल रज्जाक मोल्ला ने ये वक्तव्य दिया है. इस बयान के प्रकाश मे कई सवाल खड़े होते है. जिनका जवाब अगर माननीय मंत्री महोदय दे तो उनकी इस मारवाड़ी पर अपार कृपा होगी. सिर्फ़ और सिर्फ़ मारवाड़ीयों पर ये इल्जाम लगाने से पहले उन्होंने अपनी या अपनी जात ( यानी कि नेताओं की जात) के गिरेबान में झांक कर देखने कि कोशिश की है कि उनकी बदनीयती और दुष्कर्मों से देश के और खास कर बंगाल के क्या हालात है. सारे देश ने देखा नंदीग्राम मे हर पार्टी के नेताओं की करतूत. मासूम जनता की लाश पर इन्होने घिनौनी राजनीति की. बड़े बड़े उद्योग घरानों को जमीन देने के लिए क्या-क्या किया. टी.वी. पर आए दिन इन नेताओं की काली करतूतों के परदे फाश होते हैं. तहलका से लेकर आज तक सैकड़ों बार दिखाया जा चुका है. पर आप लोगों ने बेशर्मी का ऐसा लबादा ओढ़ रखा कि कोई भी हलचल आपकी चेतना को नही झकझोर सकती.

महोदय, घूस देकर मारवाड़ी ने तो जघन्य अपराध कर ही दिया है. लेकिन क्या आप ये बताने का या सोचने का कष्ट करेंगे कि घूस अगर मारवाड़ी ने दी है तो वो ली किसने? क्या किसी बंगाली या किसी मुसलमान या किसी और नान मारवाड़ी ने? और अगर ऐसा है तो क्या वो सही है? और अगर ग़लत है तो आपके श्री-मुख से इस विषय पर क्यों कोई वचनामृत नहीं उड़ेला गया?

जिस बंगाल की सामाजिक सरंचना और सांस्कृतिक धरोहर पर पूरे देश को नाज है वंहा आप महाराष्ट्र के और दक्षिण के अन्य नेताओं की तरह जातिवादी बयान देकर क्या सिद्ध करने मे लगें है? किस मुंह से आप इन नेताओं की आलोचना करते हैं? अपने आप को सर्वहारा वर्ग का नेता और रहनुमा मानते हैं?

घूस को इस देश की हवा, पानी, रोटी और कपड़ा के बाद पांचवी सबसे बड़ी जरुरत क्या मारवाडियों ने बनाया है? नहीं महोदय ये सब आप नेताओं और आपके दुमछल्लों अफसरों की करतूतें हैं. यंहा बच्चे के जन्म के प्रमाण पत्र लेने की बात हो या किसी के मृत्यु के प्रमाण पत्र की बात हो बगैर घूस के कुछ नहीं होता. यंहा अपना हक़ लेने के लिए घूस देनी पड़ती है. यंहा हर सरकारी विभाग का अफसर घूस लेकर ज्यादातर परिस्थितियों मे वही काम करता है जिस काम के लिए उसे नियुक्त किया गया है और जो काम उसे बगैर घूस के ही करना चाहिए. फ़िर चाहे वो कोई भी विभाग हो सेल्स टैक्स, इन्कम टैक्स, कार्पोरेशन, म्यूनिसिपैलिटी,या कोई भी विभाग.

महोदय क्या ये बताने का आप कष्ट करेंगे कि आपकी इस महत्वपूर्ण जानकारी का स्रोत क्या है कि घूस देकर केवल मारवाड़ी ही काम करवातें है? और दूसरो का हक़ मारकर बैठे हैं.

जिस कुकर्म के लिए पूरे देश के लोग जिम्मेदार है, समाज के हर वर्ग कि भागीदारी है वंहा अपने घिनौने राजनैतिक स्वार्थ पूर्ति के लिए सिर्फ़ एक समुदाय के लोगों पर लांछन लगाने को जो निंदनीय कर्म आपने किया है उसके लिए इस देश की जनता आपको कभी माफ़ नहीं करेगी.

12 comments:

आशीष said...

सारा देश चोर है, ऐसे में किसी एक को निशाने पर रखना सरासर गलत है, रेल में टिकट नहीं मिलने पर मै भी टीटी की मेहरबानी चाहता हूं,

चंद्रभूषण said...

माकपा नेताओं का व्यवहार प. बंगाल में किसी भी क्षेत्रीय पार्टी जैसा ही है। कई बार तो ये लोग छोटे पैमाने पर राज ठाकरे तक को मात देते नजर आते हैं। कभी मारवाड़ियों, कभी बिहारियों तो कभी यूपी वालों को निशाने पर लेने की रणनीति सिर्फ खुद को खांटी बंगाली साबित करने की होती है, जिसके जरिए दरअसल वे बंगालियों में अपने कुशासन के प्रति व्याप्त घृणा को 'मैनेज' करते हैं।

अनिल रघुराज said...

चंद्रभूषण की बात से सौ फीसदी सहमति। वाकई लेफ्ट के नेता किसी से कम नहीं है।

Shiv Kumar Mishra said...

अरे भैया ये रज्जाक साहब के पास कुछ पहुंचा नहीं होगा. अगर 'भाषा चेतना समिति' की बैठक में ऐसे लोग आयेंगे तो और क्या बोलेंगे? इनसे और क्या आशा करेंगे आप?

भाषा का उनका ज्ञान किसी मारवाड़ी द्वारा घूस देने से शुरू होकर वहीं खत्म हो जाता है. वैसे ये अकेले नहीं हैं. कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी भी इसी स्तर के हैं. उनमें से एक तो हाल ही में साहित्य अकादमी के अध्यक्ष्य पद को प्राप्त हो चुके हैं. बैठे-बैठे जम्हाई आती है तो ऐसा ही कुछ बोल देते हैं.

संजय बेंगाणी said...

घूस संस्कृति निजीकरण से समाप्त होगी. सरकार व सरकारी अमला घूस पर चलता है.

Pramod Singh said...

कोरबे ना! कोरबे ना! माफ़!

Gyandutt Pandey said...

मैं मारवाड़ - शेखावाटी में पर्याप्त समय रह चुका हूं। वहां के लोगों की सज्जनता - सहृदयता और कर्मठता का कायल हूं।
आपका इस निन्दनीय बयान पर गुस्सा पूर्णत: जायज है।

Sanjeet Tripathi said...

ऐसे लोगों को नेता कहना भी नही चाहिए, ऐसे ही लोगों के चलते तो "नेता" शब्द एक तरह से गाली बन चुका है।

Priyankar said...

सब भाई लोग इतना बोल चुके हैं नेताओं के सम्मान में कि हम क्या बोलें ? बस सहमति जताते हैं .

समाज विकास said...

सम्मेलन द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ती:

पश्चिम बंगाल के भूमि सुधार मंत्री श्री अब्दूल रज्जाक मौल्ला की कथित
टिप्पणी के विषय में अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन के अध्यक्ष श्री
सीताराम शर्मा ने मंत्री श्री मौल्ला से मालदह में फोन पर बातचीत कर अपना
असंतोष एवं प्रतिवाद ज्ञापित किया। श्री मौल्ला ने उन्हें स्पष्ट किया कि
उनकी कथित टिप्पणी को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया जा रहा है। श्री
मौल्ला ने अपने वक्तव्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि उन्होंने यह कहा था
मारवाड़ी समुदाय मुख्यतः व्यवसाय में है अपने व्यवसाय को अच्छा ‘‘मैनेज’’
करना जानते हैं। श्री मौल्ला ने कहा इस ‘‘मैनेज’’ ‘शब्द को मीडिया द्वारा
गलत रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। श्री मौल्ला ने श्री शर्मा से कहा
कि वे मारवाड़ी समाज सहित सभी समाज की इज्जत करते हैं एवं जातिगत तथा
साम्प्रदायिक आधारित टिप्पणी में विश्वास नहीं करते । उन्होंने कहा कि
मेरा अभिप्राय मारवाड़ी समाज की भावना को ठेस पहुँचाना कतई नहीं था।
अखिल भारतवर्षीय मारवाड़ी सम्मेलन, मंत्री महोदय के स्पष्टीकरण पर संतोष
व्यक्त करते हुए ऐसे संवेदनशील विषय पर मंत्रियों द्वारा टिप्पणी में
संयम एवं सावधानी बरतने की अपील करती है। सम्मेलन मारवाड़ी समाज से भी
मंत्री महोदय के स्पष्टीकरण एवं ठेस नहीं पहुंचाने के वक्तव्य को सही
भावना के साथ लेने की अपील करता है। -शम्भु चौधरी (सहयोगी संपादक, समाज
विकास), दिनांक : 22.02.2008
Please see original letter of AIMF
www.samajvikas.in
http://groups.google.com/group/samajvikas

निशाचर said...

ये मुल्ला खुद कौन है? एक बंग्लादेशी घुसपैठिया जो कम्युनिस्टों को घूस खिला कर भारत में घुसा . आज मंत्री बन गया तो दूसरों पर लांछन लगाता है..............

नीरज गोस्वामी said...

आप के लेख ने मंत्री से माफ़ी मंगवा ली और क्या चाहिए बंधू...बहुत ज़ोरदार लिखे हैं आप. ये मंत्री संत्री बने ही उस चिकनी मिटटी के होते हैं जिस पर शर्म लिहाज़ का पानी टिकता ही नहीं.
नीरज
{पोस्ट देर से पढने और टिपियाने पर क्षमा}