Friday, July 25, 2008

एक आहट रोज आए

आहट की आवाज़ सुनी
जैसे कह कह रहा हो;
मैं आ गया हूँ
आ गया हूँ तुम्हें डराने
तुम्हें एहसास दिलाने कि;
तुम अकेले नहीं हो
अकेले नहीं हो तुम
मैं भी तो हूँ
बस, आया था यही बताने

हाँ, आहट ही तो है
एक आहट सुख की
और एक आहट दुःख की
एक उसके उसके आने की
और एक उसके जाने की
एक उसे पाने की
एक सब लुट जाने की

आहटों की राह ताके
आहटों में मन है झांके
आहटों के साथ जीना
औ उन्ही के साथ मरना
आहटों का साथ हैं
आहटों का हाथ है

क्या पता क्या ले के आए
क्या पता क्या ले के जाए
फिर भी आँखें खोजती हैं
एक आहट जो सताए
साथ लाये ज़िंदगी या
साथ लेकर मौत आए
किंतु दिल बोला है करता
एक आहट रोज आए


बाल किशन
२५-०७-२००८
प्रातः ९:३१

27 comments:

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

kamal ki aahat hai..

PD said...

bahut badhiya sir..

Ek aahat jiske intazaar me log jindgi gujaar den..

Rajesh Roshan said...

कुछ विरोधाभास है आपकी कविता में.... अब ये अलंकार रूप में है या कवि की गलती समझ में नही आ रहा.... बावजूद इसके आप प्रयास जरुर करे....

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।

pallavi trivedi said...

badhiya hai...

नीरज गोस्वामी said...

ये आहट सही लगी...
राहत इन्दोरी साहेब का एक शेर है:
"किसने दस्तक दी दरवाजे पर, कौन है
आप तो अन्दर हैं फ़िर ये बाहर कौन है
नीरज

Shiv Kumar Mishra said...

लगता है नीरज भइया के कल वाले कमेन्ट का असर आज की कविता में दिखाई दे रहा है. ये आहट तो हमें भी पसंद आई...ऐसे ही अपने आने की आहट देते रहिये.

Gyandutt Pandey said...

लगता है नीरज की की भेजी कलम मिल गयी आपको। बड़ा तेज कूरियर है!

Udan Tashtari said...

वाह जी वाह!! गजब आहट है..कभी कहीं बटोरा था:

अंदाज हूबहू उसकी आवाजे पा का था...
दरवाजा खोल के देखा, झोंका हवा का था!!


--बहुत खूब!

Rohit Tripathi said...

बहुत achee आहट है sir जी

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Rohit Tripathi said...

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अभिषेक ओझा said...

आहात तो सच में अच्छी है... !

seema gupta said...

क्या पता क्या ले के आए
क्या पता क्या ले के जाए
फिर भी आँखें खोजती हैं
एक आहट जो सताए
साथ लाये ज़िंदगी या
साथ लेकर मौत आए
किंतु दिल बोला है करता
एक आहट रोज आए

" bhut sunder, behtreen"
hva kee srsraht se bhee lge taire hee aahet aaye hai,is ek umeed may jane humne kitne sadyeena beetayen hain"

sab kuch hanny- hanny said...

aaj pahli baar aapka blog dekha, kafi achchhi kavitai hain] ek aahat ko padh meine v apne aas paas ki aahat suni.
bhavnao ko kafi achche se ukera hai is kavita me...

रंजना said...

किशन भाई, बहुत अच्छी लगी आपकी रचना.पिछली रचना भी मुझे बहुत पसंद आई थी.
कविता भाव,शब्द और शिल्प का समुचित समन्व्यय/सामंजस्य है.पर इसमे भाव प्रमुख होता है. भाव यदि सुंदर न हो तो शब्द शिल्प व्यर्थ हो जाते हैं.
मुझे आपकी कविताओं में एक अच्छे कोमल भावुक ह्रदय व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं. यदि आप इसके प्रति गंभीर हो जायें तो निश्चित रूप से बहुत ही उत्कृष्ट लिख पाएंगे.

P. C. Rampuria said...

किंतु दिल बोला है करता
और भाई भतीजे म्हारा दिल तो यो बोल रहया सै
की इतनी सुथरी कविता ताऊ नै तो इब तक ना पढी ! भाई लिखता रह ! और आगे ही आगे बढ़ता रह !
घण्णी बधाई तन्नै , इतनी सुथरी कविता पढाण
खातर !

मोहन वशिष्‍ठ said...

बालकिशन जी आपका जबाव नहीं मैं तो वैसे भी आपकी लेखनी का तूफान पंखा हूं आपको बहुत पढता हूं मजा आ गया अच्‍छी लगी आपकी ये भावमय आहट बधाई हो आपको

राज भाटिय़ा said...

आहट पर ही तो जिन्दगी टिकी हे बाल किशन जी,
आप की कविता बहुत सुन्दर लगी धन्यवाद

दिनेशराय द्विवेदी said...

आहट पहुंच ही गई हम तक। कविता लेकर।

Mrs. Asha Joglekar said...

ये आहट तो कुछ देकर ही गई है लेकर नही और इसका तोहफा बहुत पसंद आया ।

डा० अमर said...

बालकिशन भईय्या,
यह आहट कहीं इनकम टैक्स वालों की तो नहीं ? आये तो समझे, लेकिन मूड़ पटक रहे हैं कि आखिर क्या लेकर जाये..?

मेरे पापी मन में तो यही खटक रहा कि ई आहटिया
' सर्च नोटिस लेकर आये और दबा माल लेकर जाये 'वाली तो नहीं रही !

जहाँ तक हमरा दिमाग दौड़ेगा..हम उँहीं तक दौड़ायेंगे न ?

Smart Indian said...

बहुत सुंदर बालकिशन जी - आते रहना पड़ेगा नयी कवितायें पढने.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

bahut sundar likha hai ji likhte rahe ahat wakai mein sundar hai

आभा said...

आहट में सब कुछ ... बहुत सुन्दर ...

shalu said...

pahli baar aapkaa blog dekha kaafi accha laga sabse acchaa aahat ko padkar laga.
vichaaroon ka prastutikaran kaafi badiaa hai aahaat ekdam sateek aahahtoon kaa ehsaas karaati hai

शोभा said...

हाँ, आहट ही तो है
एक आहट सुख की
और एक आहट दुःख की
एक उसके उसके आने की
और एक उसके जाने की
एक उसे पाने की
एक सब लुट जाने की

bahut sundar likha hai. badhayi sweekaren.

दराज फतेहपुरी said...

जनाब बालकिशन साहेब,

देर से आने के लिए मुआफी चाहता हूँ. जनाब नज़्म की सुन्दरता दिल में बस गई. नाज्मियत को उरूज पर ले जाकर बैठा दिया आपने. आपको हमारा सलाम. रोशनाई की चमक ऐसे ही बनी रही, यही दुआ है.